Monday, 20 June 2011

नत्था की सच्चाई

            फिल्म पीपली लाइव में हमने एक किसान की आत्म कथा को पर्दे पर देखा और तालियाँ मार मार के फिल्म को हिट करा दिया| पर क्या किसी ने उस कहानी को एक आम और वास्तविक किसान की कहानी से जोड़ कर देखा,नहीं ना | आज भी हमारे देश की आधी से अधिक आबादी गावों में रह रही है | ये वही किसान है जो हमारे खाने के लिए तपती धूप में मेहनत कर के अनाज उगाता है और आज वही किसान आत्महत्या कर रहा है |
            जिनके पास ज़मीन है सरकार उन्हें किसान की श्रेड़ी में जोडती है पर असल में ५-१० बीघे ज़मीन की मिलकियत रखने वाला ही असल किसान है जो अपने खेत में खुद मेहनत करता है | बहुत ज्यादा ज़मीन वाले तो ज़मीदार हैं जो मजदूरों से अपनी ज़मीन पर खेती करवाकर उन्हें दो वख्त का अनाज दे देते हैं | पर अधिक फायदा किसका हो रहा है, ५ बीघे वाले किसान का या ५० बीघे वाले ज़मीदार का|
            एक साल में दो फसले काटकर छोटे किसान का बस इतना ही मुनाफा है की वो अपने एवं अपने परिवार का पेट पाल सके और अगर कुछ बचा भी तो ज़मीदार से लिया क़र्ज़ कुछ कम कर सके | आज छोटे किसानो के ऊपर ज़मीदारो या बैंक का क़र्ज़ बढ़ता ही जा रहा है और सरकारी गोदामों में बेचे गए उसके अनाज का मूल्य घटा या एक जगह पर रुका हुआ है | बुंदेलखंड में किसानो की आत्महत्या का कारण अत्यधिक कर्ज में डूबा हुआ किसान ही है | ये भारत के किसान की कोई नई समस्या नहीं है,ये तो सदियों से चली आ रही रीत है की अगर किसान अपना क़र्ज़ न उतर पाए तो उसका बेटा तो है ही |

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